Wednesday, October 26, 2005

नारी

नाचती है मरघट में जो कराल काली
वही है प्रियतमा मधु अधरों वाली

मोहन की राधा, वही मजनूँ की लैला
रोमियो की जुलियट और राम की सीता
पूर्णिमा है वही और अमावस्या काली

पूर्ण करती है वही मनोरथ सारे
चूर्ण करती है वही अरमान सारे

जननी है वही माँ अन्नपूर्णा
सजनी है वही अन्तःकक्ष की प्यारी

वही है नर्तकी रंगशाला की शोभा
विषकन्या भी वही, वही है माताहारी

नाचती है जो सदाशिव के शव पर
सती होती है वही पति की चिता पर

--लक्ष्मीनारायण गुप्त
२६ अक्ठूबर २००५

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