(पहिली पंक्ति डा० महेश चन्द्र गुप्त "खलिश" के आभार से)
कोरी कविता से लड़की नहीं पटती है
शेखी बघारने से भी बात नहीं बनती है
कभी उसकी अदाओं पर रीझ जाओ
खीझो नहीं उसके नखरों से बल्कि मुस्कराओ
कभी इशारों से इश्क जताओ
कभी हौले से नैना लड़ाओ
फिर ज़रा ज़रा सा बतियाओ
कितनी सुन्दर हैं उसकी आँखैं यह बताओ
फिर काफी हाउस में काफी पिलाओ
बिल्कुल हल्का सा इश्क जताओ
हैवी बन के हावी न हो जाओ
बालीवुड के हीरो की तरह न बड़बड़ाओ
मूर्खता अपनी उसे न दिखाओ
आजकल की लड़कियाँ मूर्ख नहीं होती हैं
ऐसी बातें वे खूब समझती हैं
धीरे धीरे अपना इश्क बढ़ाओ
उसे भी अपने रंग में रँगाओ
फिर एक पिक्चर की डेट बनाओ
अच्छे रेस्टोरान्टमें खाना खिलाओ
अगर यहाँ तक पहुँच गये हो
तो समझ लो लड़की पट ही गई है
छोड़ दो खुद को उसके सहारे
समर्पण की यदि तुम्हें कला आगई है
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२९ मई २००६
At present, this blog is set up to publish my Hindi poems and accept comments from the readers. Some contributions from others are also published from time to time. Laxmi N. Gupta
Monday, May 29, 2006
Thursday, May 25, 2006
कुछ प्रिय कवितायें
कुछ कवितायें मुझे बहुत प्रिय हैं किन्तु पूरी पूरी याद नहीं हैं। यदि किसी को पूरी याद हों या यदि अन्तर्जाल पर उपलब्ध हों तो लिखने की कृपा करें।
१। यह कविता दिनकर जी की हैः
राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी
लेकिन दोनों की कितनी भिन्न कहानी
राजा के मुख में हँसी कण्ठ में माला
रानी का अन्तर द्रवित दृगों में पानी
डोलती सुरभि राजा घर कोने कोने
परियाँ सेवा में खड़ी सजा कर दोने
खोले अंचल रानी व्याकुल सी आई
उमड़ी जाने क्या व्यथा लगी वह रोने
लेखनी लिखे मन में जो निहित व्यथा है
रानी की निशि दिन गीली रही कथा है
त्रेता के राजा क्षमा करें यदि बोलूँ
राजा रानी की युग से यही प्रथा है
नृप हुये राम तुमने विपदायें झेलीं
थी कीर्ति उन्हें प्रिय तुम वन गयीं अकेली
वैदेहि तुम्हें माना कलंकिनी प्रिय ने
रानी करुणा की तुम भी विषम पहेली
रो रो राजा की कीर्तिलता पनपाओ
रानी आयसु है लिये गर्भ वन जाओ
२। कलिंग युद्ध के बाद अशोक की ग्लानि की यह कविता प्रसाद जी की है। जहाँ तक मुझे याद पड़ रहा है, यह उनके काव्य संग्रह लहर से हैः
जलता है यह जीवन पतंग
यह महा दम्भ का दानव
पीकर अनंग का आसव
कर रहा महा भीषण रव
जलने की क्यों न उठे उमंग
यह सुख कैसा शासन का
शासन रे मानव मन का
गिरि भार बना सा तिनका
यह घटा टोप दो दिन का
फिर रवि शशि किरणों का प्रसंग
ऊँचा है आज मगध सिर
पद तल पर विजित पड़ा गिर
जीवन कितना अति लघु क्षण
तृष्णा यह अनिल शिखा बन
दिखलाती रक्तिम यौवन
बह जा बन करुणा की तरंग
३। यह कविता सुभद्रा कुमारी चौहान की है जो ब्रिटिश सरकार ने वर्जित कर दी थीः
वीरों का कैसा हो वसन्त
भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर ऊधर गान
है रंग और रण का विधान
मिलने आये हैं आदि अन्त
वीरों का...
भूषण अथवा कवि चन्द नहीं
बिजली भर दे वह छंद नहीं
है कलम बँधी स्वच्छंद नहीं
अब तुम्हीं बताओ हाय हन्त
वीरों का...
गलबाहें हों या हो कृपाण
चल चितवन हो या धनुष वाण
अब यही समस्या है दुरन्त
वीरों का...
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२५ मई २००६
१। यह कविता दिनकर जी की हैः
राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी
लेकिन दोनों की कितनी भिन्न कहानी
राजा के मुख में हँसी कण्ठ में माला
रानी का अन्तर द्रवित दृगों में पानी
डोलती सुरभि राजा घर कोने कोने
परियाँ सेवा में खड़ी सजा कर दोने
खोले अंचल रानी व्याकुल सी आई
उमड़ी जाने क्या व्यथा लगी वह रोने
लेखनी लिखे मन में जो निहित व्यथा है
रानी की निशि दिन गीली रही कथा है
त्रेता के राजा क्षमा करें यदि बोलूँ
राजा रानी की युग से यही प्रथा है
नृप हुये राम तुमने विपदायें झेलीं
थी कीर्ति उन्हें प्रिय तुम वन गयीं अकेली
वैदेहि तुम्हें माना कलंकिनी प्रिय ने
रानी करुणा की तुम भी विषम पहेली
रो रो राजा की कीर्तिलता पनपाओ
रानी आयसु है लिये गर्भ वन जाओ
२। कलिंग युद्ध के बाद अशोक की ग्लानि की यह कविता प्रसाद जी की है। जहाँ तक मुझे याद पड़ रहा है, यह उनके काव्य संग्रह लहर से हैः
जलता है यह जीवन पतंग
यह महा दम्भ का दानव
पीकर अनंग का आसव
कर रहा महा भीषण रव
जलने की क्यों न उठे उमंग
यह सुख कैसा शासन का
शासन रे मानव मन का
गिरि भार बना सा तिनका
यह घटा टोप दो दिन का
फिर रवि शशि किरणों का प्रसंग
ऊँचा है आज मगध सिर
पद तल पर विजित पड़ा गिर
जीवन कितना अति लघु क्षण
तृष्णा यह अनिल शिखा बन
दिखलाती रक्तिम यौवन
बह जा बन करुणा की तरंग
३। यह कविता सुभद्रा कुमारी चौहान की है जो ब्रिटिश सरकार ने वर्जित कर दी थीः
वीरों का कैसा हो वसन्त
भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर ऊधर गान
है रंग और रण का विधान
मिलने आये हैं आदि अन्त
वीरों का...
भूषण अथवा कवि चन्द नहीं
बिजली भर दे वह छंद नहीं
है कलम बँधी स्वच्छंद नहीं
अब तुम्हीं बताओ हाय हन्त
वीरों का...
गलबाहें हों या हो कृपाण
चल चितवन हो या धनुष वाण
अब यही समस्या है दुरन्त
वीरों का...
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...२५ मई २००६
Tuesday, May 23, 2006
क्या आप जानते हैं?
१। जैसे भारतीय भाषाओं में तक्नीकी शब्द संस्कृत भाषा से लिये जाते हैं, वैसे ही थाई भाषा में भी। हालाँकि इन शब्दों का उच्चारण भिन्न होता है। निम्न उदाहरणों पर गौर करियेः
शब्द थाई शब्द (संस्कृत) थाई उच्चारण
टेलीफोन दूर-शब्द थोरोसप
वायुयान आकाशयान अगत-यन
टिकल का सौआँ भाग शतांश सितं (टिकल थाई मुद्रा का नाम है)
रेलवे ट्रैफिक सुपरिटेन्डेन्ट रथ-चारण-प्रत्यक्ष
इरीगेशन ओफिसर वारिसीमाध्यक्ष
2। थाईलैन्ड के राजा का नाम भूमिबोल राम IX है। भूमिबोल, भूमिपाल का अपभ्रन्श है।
3। थाईलैन्ड में अयुत्थ्या नाम का नगर है जिसका नाम अयोध्या के ऊपर रखा गया है। कुछ वर्ष पूर्व मेरी पुत्री वहाँ गयी थी। वहाँ पर बहुत सारे हिन्दू और बौद्ध मन्दिर हैं।
4। थाई और कम्बोडियन भाषाओं की लिपियाँ ब्रह्मी लिपि पर आधारित हैं जिस पर सारी भारतीय भाषाओं की लिपियाँ आधारित हैं।
5। इन्डोनेशियन भाषा (जिसे वे बहाशा कहते हैं) में ऐतिहासिक कारणों से बहुत से शब्द संस्कृत मूल के हैं। जैसा कि शायद आप जानते होंगे उनकी राष्ट्रीय एअरलाइन्स का नाम गरुड़ है। कुछ और उदाहरण नीचे दे रहा हूँ:
स्थानों के नाम (बहाशा) संस्कृत
जकार्ता अयोध्याकृत
ब्रामो ब्रह्मा
सुरबाया सुर-भय
स्मेरो सुमेरु
व्यक्तियों के नाम
वीर पुस्तक, सुरधिपुर, आर्य-आद्विजय, सूर्यप्रणत, सुसीलो युधोयोनो, सुकर्णो, मेघावती सुकर्णोपुत्री
यहाँ पर एक उल्लेखनीय बात है कि सुकर्णो की पुत्री का मेघावती नाम भारतीय राजनेता बीजू पटनायक, जो सुकर्णो के परम मित्र थे, ने रखा था। सुसीलो युधोयोनो इन्डोनेशिया के वर्तमान राष्ट्रपति का नाम है।
6। इन्डोनेशिया के अन्तिम हिन्दू राज्य का नाम मजापहित संस्कृत बिल्व सिक्त का अपभ्रंश है।
7। दशवीं शताब्दी में कम्बोडिया तांत्रिक और संस्कृत भाषा का केन्द्र था।
8। ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दी में लोग बुद्ध धर्म और संस्कृत के अध्ययन के लिये लोग भारत से जावा और सुमात्रा जाते थे।
9। इन्डोनेशियन मुस्लिम शंकर जी को आदम का पुत्र मानते हैं।
10। इन्डोनेशिया में इस्लाम के पाँच सिद्धान्तों को पंच पान्डव कहते हैं।
11। सोलहवीं शताब्दी में सम्राट अकबर ने अपने दीवान राजा टोडरमल के आग्रह पर फारसी को हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की जगह वित्त विभाग की भाषा बनाया।
12। मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज पर विजय प्राप्त कर अपने सिक्के चलाये । उन सिक्कों पर देवनागरी में "श्री महमद साय, श्री हमीर" लिखा गया।
13। महमूद गज़नवी ने ग्यारहवीं शताब्दी में चाँदी का दिरहम चलाया जिनमें यह लिखावट थीः
"अव्यक्तम् एकम्, मुहम्मद अवतार, नृपति महमूद, अयं टंको महमूदपुरे घट्टे हसो जिन्यान-सम्वत्..."
14। बादशाह अकबर ने कुछ हिन्दी दोहे लिखे हैं:
जाको जस है जगत में, जगत सराहै जाहि
ताको जीवन सफल है, कहता अकबर साहि
पिथला सों मज़लिस गई, तानसेन सों राग
हँसिबो, रमिबो, बोलिबो गयो बीरबल साथ
15। औरंगज़ेब ने यह दोहा एक मिलने वाले को सुनाया थाः
टोपी लें दे, बावरी दें दे, खरे निलज
चूहा खावे मावली, तू कल बन्धे चज
16। "स्नातक" शब्द, जो आजकल ग्रैज़ुएट के अर्थ में प्रयुक्त होता है, का अर्थ है जो स्नान कर चुका है। प्राचीनकाल में शिक्षा समाप्त होने पर छात्र को कर्मकान्ड के तौर पर नदी में स्नान करना पड़ता था जिससे उसका शिष्यत्व धुल जाता था।
सन्दर्भ-पुस्तकें
1. Indo-Aryan and Hindi by Suniti Kumar Chatterji
2. A History of Sanskrit Literature by Arthur A. Macdonell
3. Among the believers: An Islamic Journey by V. S. Naipaul
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१९ मई २००६
शब्द थाई शब्द (संस्कृत) थाई उच्चारण
टेलीफोन दूर-शब्द थोरोसप
वायुयान आकाशयान अगत-यन
टिकल का सौआँ भाग शतांश सितं (टिकल थाई मुद्रा का नाम है)
रेलवे ट्रैफिक सुपरिटेन्डेन्ट रथ-चारण-प्रत्यक्ष
इरीगेशन ओफिसर वारिसीमाध्यक्ष
2। थाईलैन्ड के राजा का नाम भूमिबोल राम IX है। भूमिबोल, भूमिपाल का अपभ्रन्श है।
3। थाईलैन्ड में अयुत्थ्या नाम का नगर है जिसका नाम अयोध्या के ऊपर रखा गया है। कुछ वर्ष पूर्व मेरी पुत्री वहाँ गयी थी। वहाँ पर बहुत सारे हिन्दू और बौद्ध मन्दिर हैं।
4। थाई और कम्बोडियन भाषाओं की लिपियाँ ब्रह्मी लिपि पर आधारित हैं जिस पर सारी भारतीय भाषाओं की लिपियाँ आधारित हैं।
5। इन्डोनेशियन भाषा (जिसे वे बहाशा कहते हैं) में ऐतिहासिक कारणों से बहुत से शब्द संस्कृत मूल के हैं। जैसा कि शायद आप जानते होंगे उनकी राष्ट्रीय एअरलाइन्स का नाम गरुड़ है। कुछ और उदाहरण नीचे दे रहा हूँ:
स्थानों के नाम (बहाशा) संस्कृत
जकार्ता अयोध्याकृत
ब्रामो ब्रह्मा
सुरबाया सुर-भय
स्मेरो सुमेरु
व्यक्तियों के नाम
वीर पुस्तक, सुरधिपुर, आर्य-आद्विजय, सूर्यप्रणत, सुसीलो युधोयोनो, सुकर्णो, मेघावती सुकर्णोपुत्री
यहाँ पर एक उल्लेखनीय बात है कि सुकर्णो की पुत्री का मेघावती नाम भारतीय राजनेता बीजू पटनायक, जो सुकर्णो के परम मित्र थे, ने रखा था। सुसीलो युधोयोनो इन्डोनेशिया के वर्तमान राष्ट्रपति का नाम है।
6। इन्डोनेशिया के अन्तिम हिन्दू राज्य का नाम मजापहित संस्कृत बिल्व सिक्त का अपभ्रंश है।
7। दशवीं शताब्दी में कम्बोडिया तांत्रिक और संस्कृत भाषा का केन्द्र था।
8। ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दी में लोग बुद्ध धर्म और संस्कृत के अध्ययन के लिये लोग भारत से जावा और सुमात्रा जाते थे।
9। इन्डोनेशियन मुस्लिम शंकर जी को आदम का पुत्र मानते हैं।
10। इन्डोनेशिया में इस्लाम के पाँच सिद्धान्तों को पंच पान्डव कहते हैं।
11। सोलहवीं शताब्दी में सम्राट अकबर ने अपने दीवान राजा टोडरमल के आग्रह पर फारसी को हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की जगह वित्त विभाग की भाषा बनाया।
12। मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज पर विजय प्राप्त कर अपने सिक्के चलाये । उन सिक्कों पर देवनागरी में "श्री महमद साय, श्री हमीर" लिखा गया।
13। महमूद गज़नवी ने ग्यारहवीं शताब्दी में चाँदी का दिरहम चलाया जिनमें यह लिखावट थीः
"अव्यक्तम् एकम्, मुहम्मद अवतार, नृपति महमूद, अयं टंको महमूदपुरे घट्टे हसो जिन्यान-सम्वत्..."
14। बादशाह अकबर ने कुछ हिन्दी दोहे लिखे हैं:
जाको जस है जगत में, जगत सराहै जाहि
ताको जीवन सफल है, कहता अकबर साहि
पिथला सों मज़लिस गई, तानसेन सों राग
हँसिबो, रमिबो, बोलिबो गयो बीरबल साथ
15। औरंगज़ेब ने यह दोहा एक मिलने वाले को सुनाया थाः
टोपी लें दे, बावरी दें दे, खरे निलज
चूहा खावे मावली, तू कल बन्धे चज
16। "स्नातक" शब्द, जो आजकल ग्रैज़ुएट के अर्थ में प्रयुक्त होता है, का अर्थ है जो स्नान कर चुका है। प्राचीनकाल में शिक्षा समाप्त होने पर छात्र को कर्मकान्ड के तौर पर नदी में स्नान करना पड़ता था जिससे उसका शिष्यत्व धुल जाता था।
सन्दर्भ-पुस्तकें
1. Indo-Aryan and Hindi by Suniti Kumar Chatterji
2. A History of Sanskrit Literature by Arthur A. Macdonell
3. Among the believers: An Islamic Journey by V. S. Naipaul
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१९ मई २००६
Monday, May 22, 2006
हर लिया क्यों शैशव नादान?
(यह पंडित नरेन्द्र शर्मा की एक कविता है जो १९३२ में हिन्दी की प्रख्यात पत्रिका सरस्वती में प्रकाशित हुई थी। यह १९६० में प्रकाशित सरस्वती के हीरक जयन्ती विशेषांक में भी सम्मिलित है; जहाँ से मुझे मिली है। बहुत सुन्दर लगी मुझे इस लिये आपके साथ बाँट रहा हूँ, उनकी सुपुत्री श्रीमती लावण्या शाह की अनुमति से।...लक्ष्मीनारायण गुप्त)
हर लिया क्यों शैशव नादान?
शुद्ध सलिल सा मेरा जीवन,
दुग्ध फेन-सा था अमूल्य मन,
तृष्णा का संसार नहीं था,
उर रहस्य का भार नहीं था,
स्नेह-सखा था, नन्दन कानन
था क्रीडास्थल मेरा पावन;
भोलापन भूषण आनन का
इन्दु वही जीवन-प्रांगण का
हाय! कहाँ वह लीन हो गया
विधु मेरा छविमान?
हर लिया क्यों शैशव नादान?
निर्झर-सा स्वछन्द विहग-सा,
शुभ्र शरद के स्वच्छ दिवस-सा,
अधरों पर स्वप्निल-सस्मिति-सा,
हिम पर क्रीड़ित स्वर्ण-रश्मि-सा,
मेरा शैशव! मधुर बालपन!
बादल-सा मृदु-मन कोमल-तन।
हा अप्राप्य-धन! स्वर्ग-स्वर्ण-कन
कौन ले गया नल-पट खग बन?
कहाँ अलक्षित लोक बसाया?
किस नभ में अनजान!
हर लिया क्यों शैशव नादान?
जग में जब अस्तित्व नहीं था,
जीवन जब था मलयानिल-सा
अति लघु पुष्प, वायु पर पर-सा,
स्वार्थ-रहित के अरमानों-सा,
चिन्ता-द्वेष-रहित-वन-पशु-सा
ज्ञान-शून्य क्रीड़ामय मन था,
स्वर्गिक, स्वप्निल जीवन-क्रीड़ा
छीन ले गया दे उर-पीड़ा
कपटी कनक-काम-मृग बन कर
किस मग हा! अनजान?
हर लिया क्यों शैशव नादान?
...नरेन्द्र शर्मा
...१९३२
(सरस्वती हीरक-जयन्ती विशेषांक १९००-१९५९ से साभार)
हर लिया क्यों शैशव नादान?
शुद्ध सलिल सा मेरा जीवन,
दुग्ध फेन-सा था अमूल्य मन,
तृष्णा का संसार नहीं था,
उर रहस्य का भार नहीं था,
स्नेह-सखा था, नन्दन कानन
था क्रीडास्थल मेरा पावन;
भोलापन भूषण आनन का
इन्दु वही जीवन-प्रांगण का
हाय! कहाँ वह लीन हो गया
विधु मेरा छविमान?
हर लिया क्यों शैशव नादान?
निर्झर-सा स्वछन्द विहग-सा,
शुभ्र शरद के स्वच्छ दिवस-सा,
अधरों पर स्वप्निल-सस्मिति-सा,
हिम पर क्रीड़ित स्वर्ण-रश्मि-सा,
मेरा शैशव! मधुर बालपन!
बादल-सा मृदु-मन कोमल-तन।
हा अप्राप्य-धन! स्वर्ग-स्वर्ण-कन
कौन ले गया नल-पट खग बन?
कहाँ अलक्षित लोक बसाया?
किस नभ में अनजान!
हर लिया क्यों शैशव नादान?
जग में जब अस्तित्व नहीं था,
जीवन जब था मलयानिल-सा
अति लघु पुष्प, वायु पर पर-सा,
स्वार्थ-रहित के अरमानों-सा,
चिन्ता-द्वेष-रहित-वन-पशु-सा
ज्ञान-शून्य क्रीड़ामय मन था,
स्वर्गिक, स्वप्निल जीवन-क्रीड़ा
छीन ले गया दे उर-पीड़ा
कपटी कनक-काम-मृग बन कर
किस मग हा! अनजान?
हर लिया क्यों शैशव नादान?
...नरेन्द्र शर्मा
...१९३२
(सरस्वती हीरक-जयन्ती विशेषांक १९००-१९५९ से साभार)
Thursday, May 18, 2006
बी एन एस डी कालेज़ की कुछ यादें
आठवें दर्ज़े तक मैं गाँव के विद्यालयों में पढ़ा। तब तक हर कक्षा में मेरा प्रथम स्थान आता था। मेरे सबसे बड़े भाई मुझसे ११ साल बड़े थे। उनके एक मित्र बाबू सिंह ने समझाया कि इस लड़के में कुछ प्रतिभा है जिसके विकास के लिये इसे शहर (कानपुर) पढ़ने भेजना बहुत आवश्यक है। उन दिनों कानपुर में ही नहीं सारे उत्तरप्रदेश में बी एन एस डी कालेज़ माध्यमिक शिक्षा में अग्रणी माना जाता था। मुझे वहाँ दाखिला मिल गया, नवें दर्ज़े के सेक्शन एन में जो बहुत अच्छा सेक्शन नहीं था। एक सन्ड साहब गणित पढ़ाते थे। वे रेखागणित की किताब से प्रमेय (Theorem) की उपपत्ति (Proof) बोर्ड पर लिख देते थे जिसे हम लोग अपनी पुस्तिका में नकल कर लेते थे। न तो वह प्रमेय शिक्षक के दिमाग से गुज़रती थी, न हमारे। मेरे छात्र जीवन के ये महाशय सब से बुरे शिक्षक नहीं थे, किन्तु दूसरे नम्बर पर अवश्य थे। मेरे हमेशा गणित में शत-प्रतिशत अंक आते थे किन्तु नवें मे मैं गणित में फेल होते होते बचा। हिन्दी के शिक्षक चतुर्वेदी जी प्रथम श्रेणी के थे। उतने ही अच्छे थे जितने सन्ड साहब बुरे। किसी कारण से साल के बीच में चतुर्वेदी जी कहीं और चले गये। उनके स्थान में एक अष्ठाना साहब आये, जिनके बारे में एक घटना याद है। उन्होंने हिन्दी कविता में आये किसी शब्द के माने बताये। मेरे मुँह से बिना सोचे समझे निकल गया कि मास्टर साहब यह माने तो गलत है। उन्होंने मेरी सीट पर आके मेरे गाल पर एक करारा थप्पड़ मारा। जब वह अपनी कुर्सी पर बैठ गये तो यद्यपि मेरा गाल अभी भी तमतमा रहा था, मैंने साहस करके कहा कि, मास्टर साहब माने अभी भी गलत है। उन्होंने मेरी तरफ ऐसे घूर कर देखा कि जैसे मुझे खा जायेंगे। उस दिन के बाद न उन्होंने मुझ से कोई बात की न मैंने उनसे। लगभग चालीस साल के अमेरिका में अध्यापन के बाद मैं सोचता हूँ कि कितना फर्क है मेरी और उनकी अध्यापन प्रणाली में। मेरी कक्षा में कोई छात्र यदि मेरी गलती पकड़ता है तो मैं उसे धन्यवाद देता हूँ, दंड नहीं।
मेरे जीव-विज्ञान के शिक्षक रमेश अवस्थी बहुत अच्छा पढ़ाते थे और हिन्दी साहित्य के प्रेमी थे। उन्होंने एक काव्य प्रतियोगिता आयोजित की जिसका नाम थाः प्रकृति-दरबार। भाग लेने वालों को प्रकृति के बारे में एक-दो कवितायें पढ़नी थीं या गानीं थीं। मैं ने सेनापति का एक पद गाया थाः सेनापति उनये नये जलद सावन के, दसहूँ दिसानि घुमड़ानि भरे तोय के। वर्षा ॠतु चल रही थी। हो सकता है कि सावन का महीना भी रहा हो। श्रोताओं ने मेरी कविता का तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्वागत किया। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ जब मुझे प्रथम पुरस्कार मिला। इस पुरस्कार में मुझे रमई काका की दो पुस्तकें बौछार और फुहार के अतिरिक्त महात्मा गाँधी की आत्मकथा, जय शंकर प्रसाद की आँसू और एक आध और पुस्तकें मिलीं। इनमें से आँसू अभी तक मेरे पास है। यह मेरी गायन की प्रथम और अन्तिम प्रतियोगिता थी।
याद आ रहा है तो बता ही दूँ कि सेनापति भूषण और पद्माकर के समकालीन थे। उनका एक पद है जिसमें दाता (दानी) और सूम (कंजूस) का वर्णन एक ही शब्दों से किया गया है। कुछ पंक्तियाँ याद हैं:
नाहीं नाहीं करैं थोरी माँगैं सब दैन कहैं
मंगन को देखि पट देत बार बार हैं
जिनके मिलत बड़ी प्रापति की घटी होति
…………………………………………..
सेनापति काव्य की रचना बिचारौ या में
दाता और सूम दोऊ कीन्हे इक सार हैं
बी एन एस डी में नवीं कक्षा के सारे सेक्शनों के सर्वोत्तम विद्यार्थियों को दसवीं के सी सेक्शन में रखा जाता था। मुझे उम्मीद नहीं थी कि मैं सी सेक्शन में रखा जाऊँगा क्योंकि मेरे गणित में अंक बहुत कम थे। हिन्दी और अंग्रेज़ी में मेरे अंक बहुत अच्छे थे। बहरहाल मुझे सी सेक्शन मिल गया। दसवीं के गणित के शिक्षक का नाम था शिव नारायण दास किन्तु सभी लोग उन्हें गाँधी जी कहते थे। वे अपने हाथ से कते हुए सूत का कुर्ता धोती पहनते थे। दसवीं कक्षा शुरू होने के पहले गर्मियों से उनकी दो घंटे की अतिरिक्त कक्षा हर रविवार को शुरू हो गई थी। इस कक्षा में उन्होंने हमें गणित तो पढ़ाया ही किन्तु उसके साथ ही साथ हमें भारतीय संस्कृति से भी अवगत करायाः पाणिनि के १४ सूत्र, श्रीमती ऐनी बेसेन्ट की पुस्तकें इत्यादि। कुछ अंग्रेज़ी भी पढ़ाई। गर्मी के अन्त में परीक्षा भी हुई जिसमें मुझे सांत्वना पुरस्कार के रूप मे मिली श्रीमती ऐनी बेसेन्ट की कुछ पुस्तकें। मेरी गणित अभी भी बहुत अच्छी नहीं थी। साल शुरू होने पर दिन में सब से पहिले गाँधी जी की गणित की अतिरिक्त कक्षा होती थी। गाँधी जी ने हमें सिखाया कि हर छात्र के नाम के बाद जी लगाओ। वे स्वयं भी लगाते थे। यदि कोई छात्र बहुत प्रयत्न के बाद भी कोई चीज़ नहीं समझता था तो वे अपने मुँह पर चाँटे लगाते थे। गाँधी जी जैसा समर्पित शिक्षक मैंने कोई और नहीं देखा, न भारत में न अमेरिका में। तिमाही परीक्षा में मुझे लगा कि मैंने गणित का पर्चा पूरा सही किया है। संयोग की बात कि जिस दिन कापियाँ लौटाई गईं, मैं बीमार हो गया। दूसरे दिन जाने पर पता लगा कि मेरे कुल ९६ अंक हैं। पता चला कि शालिग्राम गुप्त जिन्होंने कापियाँ जाँची थीं, ९६ नम्बरों में से ही जाँची हैं। ६ सवाल थे जो उन्होंने १६-१६ अंक के माने। इसके फलस्वरूप किसी को भी पूरे अंक नहीं मिले। मेरा पूरे दसवें दर्ज़े में दूसरा स्थान आया। पहला स्थान रवीन्द्र का था जो हेडमास्टर पुत्तूलाल जी का पुत्र था। पहली बार मेरे सेक्शन में मेरा पहला स्थान नहीं था। कहते हैं कि जब तक ऊँट पहाड़ के नीचे नहीं जाता उसे पता नहीं चलता कि उससे भी ऊँचा कोई है। परीक्षा के बाद पुत्तूलाल जी कक्षा में सभी से हाथ मिलाने और बधाई देने आये थे किन्तु रवीन्द्र से उन्होंने केवल यह कहा था कि यह एक अंक कैसे कट गया।
पुत्तूलाल जी दसवीं कक्षा तक के इन्चार्ज़ थे और सद्गुरुशरण अवस्थी प्रिन्सिपल थे। अवस्थी जी हिन्दी के जाने माने साहित्यकार थे। पुत्तूलाल जी का व्यक्तित्व बहुत डरावना था किन्तु वे बहुत अच्छे शिक्षक थे। वे भूगोल और गणित पढ़ाते थे। इन दोनों विषयों में उनकी लिखी पुस्तकें हमारे स्कूल में चलती थीं। बहुत ही अच्छी तरह लिखी हुई पुस्तकें थीं। मैं अपने भूगोल के शिक्षक का तो नाम भी भूल गया हूँ किन्तु पुत्तूलाल जी ने एक बार हमारे शिक्षक की अनुपस्थिति में हमें पढ़ाया था, वह क्लास मुझे आज भी याद है। उस क्लास में उन्होंने हमें आस्ट्रेलिया की Whites only immigration policy के बारे में बताया था। मैं १९५८ की बात कर रहा हूँ।
बोर्ड की परीक्षा में रवीन्द्र का पूरे प्रदेश में दूसरा स्थान आया। वैसे तो मेरा क्लास में दूसरा स्थान आता था किन्तु बोर्ड परीक्षा में मेरा स्थान पाँचवाँ या छठा ही रह गया, कालेज में। उत्तरप्रदेश में मेरा छब्बीसवाँ स्थान आया जो कुछ निराशाजनक लगा था। उससे भी ज्यादा निराशाजनक लगा था यह तथ्य कि मेरी ५० रुपये वाली छात्रवृत्ति ३ अंकों से रह गई।
आज इतना ही।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१७ मई २००६
मेरे जीव-विज्ञान के शिक्षक रमेश अवस्थी बहुत अच्छा पढ़ाते थे और हिन्दी साहित्य के प्रेमी थे। उन्होंने एक काव्य प्रतियोगिता आयोजित की जिसका नाम थाः प्रकृति-दरबार। भाग लेने वालों को प्रकृति के बारे में एक-दो कवितायें पढ़नी थीं या गानीं थीं। मैं ने सेनापति का एक पद गाया थाः सेनापति उनये नये जलद सावन के, दसहूँ दिसानि घुमड़ानि भरे तोय के। वर्षा ॠतु चल रही थी। हो सकता है कि सावन का महीना भी रहा हो। श्रोताओं ने मेरी कविता का तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्वागत किया। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ जब मुझे प्रथम पुरस्कार मिला। इस पुरस्कार में मुझे रमई काका की दो पुस्तकें बौछार और फुहार के अतिरिक्त महात्मा गाँधी की आत्मकथा, जय शंकर प्रसाद की आँसू और एक आध और पुस्तकें मिलीं। इनमें से आँसू अभी तक मेरे पास है। यह मेरी गायन की प्रथम और अन्तिम प्रतियोगिता थी।
याद आ रहा है तो बता ही दूँ कि सेनापति भूषण और पद्माकर के समकालीन थे। उनका एक पद है जिसमें दाता (दानी) और सूम (कंजूस) का वर्णन एक ही शब्दों से किया गया है। कुछ पंक्तियाँ याद हैं:
नाहीं नाहीं करैं थोरी माँगैं सब दैन कहैं
मंगन को देखि पट देत बार बार हैं
जिनके मिलत बड़ी प्रापति की घटी होति
…………………………………………..
सेनापति काव्य की रचना बिचारौ या में
दाता और सूम दोऊ कीन्हे इक सार हैं
बी एन एस डी में नवीं कक्षा के सारे सेक्शनों के सर्वोत्तम विद्यार्थियों को दसवीं के सी सेक्शन में रखा जाता था। मुझे उम्मीद नहीं थी कि मैं सी सेक्शन में रखा जाऊँगा क्योंकि मेरे गणित में अंक बहुत कम थे। हिन्दी और अंग्रेज़ी में मेरे अंक बहुत अच्छे थे। बहरहाल मुझे सी सेक्शन मिल गया। दसवीं के गणित के शिक्षक का नाम था शिव नारायण दास किन्तु सभी लोग उन्हें गाँधी जी कहते थे। वे अपने हाथ से कते हुए सूत का कुर्ता धोती पहनते थे। दसवीं कक्षा शुरू होने के पहले गर्मियों से उनकी दो घंटे की अतिरिक्त कक्षा हर रविवार को शुरू हो गई थी। इस कक्षा में उन्होंने हमें गणित तो पढ़ाया ही किन्तु उसके साथ ही साथ हमें भारतीय संस्कृति से भी अवगत करायाः पाणिनि के १४ सूत्र, श्रीमती ऐनी बेसेन्ट की पुस्तकें इत्यादि। कुछ अंग्रेज़ी भी पढ़ाई। गर्मी के अन्त में परीक्षा भी हुई जिसमें मुझे सांत्वना पुरस्कार के रूप मे मिली श्रीमती ऐनी बेसेन्ट की कुछ पुस्तकें। मेरी गणित अभी भी बहुत अच्छी नहीं थी। साल शुरू होने पर दिन में सब से पहिले गाँधी जी की गणित की अतिरिक्त कक्षा होती थी। गाँधी जी ने हमें सिखाया कि हर छात्र के नाम के बाद जी लगाओ। वे स्वयं भी लगाते थे। यदि कोई छात्र बहुत प्रयत्न के बाद भी कोई चीज़ नहीं समझता था तो वे अपने मुँह पर चाँटे लगाते थे। गाँधी जी जैसा समर्पित शिक्षक मैंने कोई और नहीं देखा, न भारत में न अमेरिका में। तिमाही परीक्षा में मुझे लगा कि मैंने गणित का पर्चा पूरा सही किया है। संयोग की बात कि जिस दिन कापियाँ लौटाई गईं, मैं बीमार हो गया। दूसरे दिन जाने पर पता लगा कि मेरे कुल ९६ अंक हैं। पता चला कि शालिग्राम गुप्त जिन्होंने कापियाँ जाँची थीं, ९६ नम्बरों में से ही जाँची हैं। ६ सवाल थे जो उन्होंने १६-१६ अंक के माने। इसके फलस्वरूप किसी को भी पूरे अंक नहीं मिले। मेरा पूरे दसवें दर्ज़े में दूसरा स्थान आया। पहला स्थान रवीन्द्र का था जो हेडमास्टर पुत्तूलाल जी का पुत्र था। पहली बार मेरे सेक्शन में मेरा पहला स्थान नहीं था। कहते हैं कि जब तक ऊँट पहाड़ के नीचे नहीं जाता उसे पता नहीं चलता कि उससे भी ऊँचा कोई है। परीक्षा के बाद पुत्तूलाल जी कक्षा में सभी से हाथ मिलाने और बधाई देने आये थे किन्तु रवीन्द्र से उन्होंने केवल यह कहा था कि यह एक अंक कैसे कट गया।
पुत्तूलाल जी दसवीं कक्षा तक के इन्चार्ज़ थे और सद्गुरुशरण अवस्थी प्रिन्सिपल थे। अवस्थी जी हिन्दी के जाने माने साहित्यकार थे। पुत्तूलाल जी का व्यक्तित्व बहुत डरावना था किन्तु वे बहुत अच्छे शिक्षक थे। वे भूगोल और गणित पढ़ाते थे। इन दोनों विषयों में उनकी लिखी पुस्तकें हमारे स्कूल में चलती थीं। बहुत ही अच्छी तरह लिखी हुई पुस्तकें थीं। मैं अपने भूगोल के शिक्षक का तो नाम भी भूल गया हूँ किन्तु पुत्तूलाल जी ने एक बार हमारे शिक्षक की अनुपस्थिति में हमें पढ़ाया था, वह क्लास मुझे आज भी याद है। उस क्लास में उन्होंने हमें आस्ट्रेलिया की Whites only immigration policy के बारे में बताया था। मैं १९५८ की बात कर रहा हूँ।
बोर्ड की परीक्षा में रवीन्द्र का पूरे प्रदेश में दूसरा स्थान आया। वैसे तो मेरा क्लास में दूसरा स्थान आता था किन्तु बोर्ड परीक्षा में मेरा स्थान पाँचवाँ या छठा ही रह गया, कालेज में। उत्तरप्रदेश में मेरा छब्बीसवाँ स्थान आया जो कुछ निराशाजनक लगा था। उससे भी ज्यादा निराशाजनक लगा था यह तथ्य कि मेरी ५० रुपये वाली छात्रवृत्ति ३ अंकों से रह गई।
आज इतना ही।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१७ मई २००६
Tuesday, May 16, 2006
आधुनिक भक्त की इच्छा
(एक मित्र ने कुछ दिन पहले यह इच्छा व्यक्त की थी कि कितना अच्छा होता कि ॠषीकेष में गंगा किनारे उनकी एक कुटिया होती। मैंने उनकी इस इच्छा को यहाँ पर, उनकी अनुमति से, मुखरित करने का प्रयास किया है।)
इच्छा है मन में कि अपनी एक कुटिया हो
कुटिया में एक खटिया हो
पास में एक खुँटिया हो
खुँटिये पे लटकी एक तुलसी की माला हो
मन भक्ति से मतवाला हो
इनडोर प्लम्बिंग हो
फ़र्श पर कालीन हो
इन्टरनेट की सुविधा हो
पास में एक वैष्णव भोजनालय हो
बिना मिर्च का भोजन हो
गंगा की धारा हो
मन्दिर इक न्यारा हो
आधुनिक भक्त की सुविधा के
सारे साधन हों
पास में जंगल हो
जंगल में मंगल हो
प्राकृतिक सौन्दर्य हो
प्रभु की भक्ति हो
शरीर में शक्ति हो
पत्नी भी कभी कभी
विज़िट के लिये आती हो
मठरी अचार लाती हो
कभी कभी रात में रुक जाती हो
अभी तो इतना ही सोचा है
बाकी तो प्रभु की इच्छा है
देखो क्या होता है
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१० मई २००६
इच्छा है मन में कि अपनी एक कुटिया हो
कुटिया में एक खटिया हो
पास में एक खुँटिया हो
खुँटिये पे लटकी एक तुलसी की माला हो
मन भक्ति से मतवाला हो
इनडोर प्लम्बिंग हो
फ़र्श पर कालीन हो
इन्टरनेट की सुविधा हो
पास में एक वैष्णव भोजनालय हो
बिना मिर्च का भोजन हो
गंगा की धारा हो
मन्दिर इक न्यारा हो
आधुनिक भक्त की सुविधा के
सारे साधन हों
पास में जंगल हो
जंगल में मंगल हो
प्राकृतिक सौन्दर्य हो
प्रभु की भक्ति हो
शरीर में शक्ति हो
पत्नी भी कभी कभी
विज़िट के लिये आती हो
मठरी अचार लाती हो
कभी कभी रात में रुक जाती हो
अभी तो इतना ही सोचा है
बाकी तो प्रभु की इच्छा है
देखो क्या होता है
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१० मई २००६
Saturday, May 13, 2006
पंचवटी
मैथिलीशरण गुप्त की पंचवटी की कुछ पंक्तियाँ स्मृति से सुना रहा हूँ। सहृदय पाठकों से निवेदन है कि यदि कहीं पर इसका डिजिटल संस्करण उपलब्ध हो तो बताने की कृपा करें:
चारु चंद्र की चंचल किरणें,
खेल रहीं थीं जल थल में।
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई थी,
अवनि और अम्बर तल में।
पुलक प्रकट करती थी धरती,
हरित तृणों की नोकों से।
मानो झूम रहे हों तरु भी,
मन्द पवन के झोंकों से।
पंचवटी की छाया में है,
सुन्दर पर्ण कुटीर बना।
जिसके बाहर स्वच्छ शिला पर,
धीर वीर निर्भीक मना।
जाग रहा है कौन धनुर्धर,
जब कि भुवन भर सोता है।
भोगी अनुगामी योगी सा,
बना दृष्टिगत होता है।
बना हुआ है प्रहरी जिसका,
उस कुटिया में क्या धन है।
जिसकी सेवा में रत इसका,
तन है, मन है, जीवन है।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१३ मई २००६
चारु चंद्र की चंचल किरणें,
खेल रहीं थीं जल थल में।
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई थी,
अवनि और अम्बर तल में।
पुलक प्रकट करती थी धरती,
हरित तृणों की नोकों से।
मानो झूम रहे हों तरु भी,
मन्द पवन के झोंकों से।
पंचवटी की छाया में है,
सुन्दर पर्ण कुटीर बना।
जिसके बाहर स्वच्छ शिला पर,
धीर वीर निर्भीक मना।
जाग रहा है कौन धनुर्धर,
जब कि भुवन भर सोता है।
भोगी अनुगामी योगी सा,
बना दृष्टिगत होता है।
बना हुआ है प्रहरी जिसका,
उस कुटिया में क्या धन है।
जिसकी सेवा में रत इसका,
तन है, मन है, जीवन है।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...१३ मई २००६
Thursday, May 11, 2006
अचरज की बात
कहते हैं सभी वेद और शास्त्र,
"त्यागो अहंकार को" यही है सयानी बात।
हज़ारों सालों का यह हमारा अभ्यास,
क्यों नहीं कर पाया अहंकार का विनाश?
सोचता हूँ यह बड़े अचरज की बात,
सफल नहीं होता क्यों यह हमारा प्रयास?
एक अन्तर्दृष्टि मानस में आयी है,
आप ही बतायें क्या आपको भायी है?
हम अपना नहीं दूसरों का अहंकार मिटाते हैं,
अपना अहंकार जिससे और भी बढ़ाते हैं।
गुरु शिष्य का अहंकार मिटाता है,
शिष्य बचे या न बचे, गुरु डूब जाता है।
"मैं ब्रह्म हूँ" यह सब मानते हैं,
"अन्य कीट तुल्य हैं" ऐसा जानते हैं।
"दूसरे अहंकारी हैं" यह जानता हूँ,
"मैं प्रतिभाशाली हूँ" यह मानता हूँ।
इसी लिये कहते रहेंगे वेद शास्त्र,
"त्यागो अहंकार को" यही है सयानी बात।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...५ मई २००६
"त्यागो अहंकार को" यही है सयानी बात।
हज़ारों सालों का यह हमारा अभ्यास,
क्यों नहीं कर पाया अहंकार का विनाश?
सोचता हूँ यह बड़े अचरज की बात,
सफल नहीं होता क्यों यह हमारा प्रयास?
एक अन्तर्दृष्टि मानस में आयी है,
आप ही बतायें क्या आपको भायी है?
हम अपना नहीं दूसरों का अहंकार मिटाते हैं,
अपना अहंकार जिससे और भी बढ़ाते हैं।
गुरु शिष्य का अहंकार मिटाता है,
शिष्य बचे या न बचे, गुरु डूब जाता है।
"मैं ब्रह्म हूँ" यह सब मानते हैं,
"अन्य कीट तुल्य हैं" ऐसा जानते हैं।
"दूसरे अहंकारी हैं" यह जानता हूँ,
"मैं प्रतिभाशाली हूँ" यह मानता हूँ।
इसी लिये कहते रहेंगे वेद शास्त्र,
"त्यागो अहंकार को" यही है सयानी बात।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...५ मई २००६
Tuesday, May 09, 2006
कानपुर के कुछ कवि
कानपुर के कुछ कवि और कुछ व्यक्तिगत स्मृतियाँ
अभी फुरसतिया का यह लेखः http://hindini.com/fursatiya/?p=126
पढ़ कर मैंने सोचा कि मैं भी कुछ इस विषय पर लिखूँ। तो प्रस्तुत है यह संक्षिप्त संस्मरण।
कानपुर में नये गंज और बिरहाना रोड के नुक्कड़ पर एक छोटा सा पुस्तकालय था जहाँ मैं अक्सर जाया करता था। एक दिन जब मैं वहाँ पहुँचा तो एक कविगोष्ठी हो रही थी। थोड़े से ही लोग थे, करीब ५०। गयाप्रसाद शुक्ल "सनेही" जी की ७५ वीं वर्षगाँठ मनाई जा रही थी। सनेही जी स्वयं वहाँ पर थे, दोहरे बदन के सफेद कुरता धोती और टोपी में। उन्होंने खुद भी कुछ कवितायें सुनाईं जिनमें से एक थीः
"ठसका नहीं मैं, पछत्तर बरस का"
सनेही जी पुरानी पूर्व-छायावाद शैली के कवि थे जब समस्यापूर्ति का बोलबाला था। जिनको पता न हो, समस्यापूर्ति में एक पंक्ति दे दी जाती थी। कवि का काम होता था कि ऐसी कविता लिखे जिसकी अन्तिम पंक्ति दी हुई पंक्ति हो। जैसे यह आखिरी पंक्ति हैः "केहि कारण सुन्दरि हाथ जरी।"
बी एन एस डी कालेज़ में जहाँ मैं पढ़ता था, एक बार कवि सम्मेलन हुआ था जिसमें दयाशंकर दीक्षित "देहाती" जी को सुना था। कुछ बानगी याद है। अमेरिका में आइज़नहावर प्रेसीडेन्ट थे, सोवियट यूनियन में ख्रुश्चेव और मिस्र में नासिर। स्वेज़ नहर का नासिर ने फिलहाल ही राष्ट्रीयकरण किया था। इस पृष्ठभूमि पर सुनियेः
१। अइसन हो वर दी जिये, अइसनहावर दीजिये जा सों मिटैं कलेश।
खुरुचि दिया ख्रुश्चेव ने मलहम मलैं डलेस।।
२। मिस्र एक रजधानी है
जहँ स्वेज बनी मिसरानी है
नासिर इसका सेनानी है
वह अपना खून बहा देगा
इस नहर में जितना पानी है
भारतीय साहबों के ऊपरः
३। सूट बूट नेकटाई पहिरे, अति कोमल हैं गात।
साहेब मेड इन इन्डिया, चले बजारै जात।।
एक हास्यकवि उन दिनों हुआ करते थे जिनका नाम था मणिराम शर्मा द्विवेदी "नवीन"। मेरे ख्याल में उन्नाव के थे। उनके कुछ कविताखंड प्रस्तुत करता हूँ:
१। इतना तो करना स्वामी जब ये प्राण तन से निकलें
तन हो किसी लढ़ा पर, जिह्वा दही बड़े पर
उनके चबूतरे पर, ये प्राण तन से निकलें
२। पेटु जो पिराय तो मँगाय खाव चूरन
खाऊ बीर पंडित खलाए पेटु घूमा करैं
मन अभिलाष श्राद्ध मास करै पूरन
पेटु जो पिराय तो मँगाय खाव चूरन
छोटे मोटे बहुत सारे कवि हुआ करते थे। हमारे गाँव के पास नर्वल में जहाँ मैं सातवीं और आठवीं कक्षा में पढ़ा एक कवि थे, रामनारायण शर्मा "किसानबालक"। उनकी एक पंक्ति थीः "वासना कर विरक्ति में लीन, बजाता ब्रह्मवाद की बीन।" मैं भास्करानन्द इन्टरकालेज़ में पढ़ता था। वहाँ पर एक हिन्दी के अध्यापक थे द्विवेदी जी जो कविता लिखते थे। कालेज के सालाना जलसे में उनकी एक कविता सुनी थीः "मैं प्रेम नगर का वासी हूँ, मुझे प्रेम नगर को जाना है।" लम्बे बाल रखते थे और रसिकहृदय थे।
बी एन एस डी में ११वीं कक्षा में मेरे हिन्दी के अध्यापक रामेश्वर प्रसाद द्विवेदी भी कवि थे। ये जनाब अपने को बहुत ही प्रगतिशील और समाजवादी मानते थे और क्लास में भी प्रधानाचार्य श्री सद्गुरुशरण अवस्थी- जो जाने माने हिन्दी के विद्वान थे- की दकियानूसी की आलोचना किया करते थे। उनकी कोई कविता याद नहीं आ रही है। उनसे संबंधित एक कटु प्रसंग अवश्य याद है। मेरे साथ एक लड़का पढ़ता था अशोक, जिससे मेरी कुछ मित्रता थी किन्तु हमारी आर्थिक पृष्ठभूमि में बहुत अन्तर था जिसे अधिक मित्रता सम्भव नहीं थी। यह लड़का कानपुर के ए डी एम का पुत्र था किन्तु कोई गरूर नहीं था, सौम्य स्वभाव का था। बहरहाल तिमाही या छमाही परीक्षा में मेरा हिन्दी का परचा बहुत अच्छा हुआ था। मुझे उम्मीद थी कि टाप नम्बर मेरे ही आयेंगे। द्विवेदी जी ने उत्तरपुस्तिका लौटाने के पहले अशोक के परचे की बेहद तारीफ की। मैं सोच रहा था कि मेरा क्या हुआ। कापियाँ लौटाने के पहले द्विवेदी जी ने कहा कि "अरे हाँ, लक्ष्मीनारायण के भी अंक अशोक के बराबर हैं।" मैं गाँव से आया था, मेरा बाप ए डी एम नहीं था और मेरे कपड़े फटे पुराने थे। इतने वर्षों बाद भी यह बात खटकती है। विषय से थोड़ा भटक गया किन्तु यह भी बताना चाहूँगा कि सभी अध्यापक ऐसे नहीं थे। बिशुन नारायण टंडन अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। उन्होंने हमें "First Person Singular" पर एक निबंध लिखने को दिया था। मेरे निबंध पर उन्होंने लिखा था "Written with gusto" और सारे क्लास में मेरी कापी घुमाई गई थी। मुझे अपने ऊपर बड़ा गर्व हुआ था तब।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...८ मई २००६
अभी फुरसतिया का यह लेखः http://hindini.com/fursatiya/?p=126
पढ़ कर मैंने सोचा कि मैं भी कुछ इस विषय पर लिखूँ। तो प्रस्तुत है यह संक्षिप्त संस्मरण।
कानपुर में नये गंज और बिरहाना रोड के नुक्कड़ पर एक छोटा सा पुस्तकालय था जहाँ मैं अक्सर जाया करता था। एक दिन जब मैं वहाँ पहुँचा तो एक कविगोष्ठी हो रही थी। थोड़े से ही लोग थे, करीब ५०। गयाप्रसाद शुक्ल "सनेही" जी की ७५ वीं वर्षगाँठ मनाई जा रही थी। सनेही जी स्वयं वहाँ पर थे, दोहरे बदन के सफेद कुरता धोती और टोपी में। उन्होंने खुद भी कुछ कवितायें सुनाईं जिनमें से एक थीः
"ठसका नहीं मैं, पछत्तर बरस का"
सनेही जी पुरानी पूर्व-छायावाद शैली के कवि थे जब समस्यापूर्ति का बोलबाला था। जिनको पता न हो, समस्यापूर्ति में एक पंक्ति दे दी जाती थी। कवि का काम होता था कि ऐसी कविता लिखे जिसकी अन्तिम पंक्ति दी हुई पंक्ति हो। जैसे यह आखिरी पंक्ति हैः "केहि कारण सुन्दरि हाथ जरी।"
बी एन एस डी कालेज़ में जहाँ मैं पढ़ता था, एक बार कवि सम्मेलन हुआ था जिसमें दयाशंकर दीक्षित "देहाती" जी को सुना था। कुछ बानगी याद है। अमेरिका में आइज़नहावर प्रेसीडेन्ट थे, सोवियट यूनियन में ख्रुश्चेव और मिस्र में नासिर। स्वेज़ नहर का नासिर ने फिलहाल ही राष्ट्रीयकरण किया था। इस पृष्ठभूमि पर सुनियेः
१। अइसन हो वर दी जिये, अइसनहावर दीजिये जा सों मिटैं कलेश।
खुरुचि दिया ख्रुश्चेव ने मलहम मलैं डलेस।।
२। मिस्र एक रजधानी है
जहँ स्वेज बनी मिसरानी है
नासिर इसका सेनानी है
वह अपना खून बहा देगा
इस नहर में जितना पानी है
भारतीय साहबों के ऊपरः
३। सूट बूट नेकटाई पहिरे, अति कोमल हैं गात।
साहेब मेड इन इन्डिया, चले बजारै जात।।
एक हास्यकवि उन दिनों हुआ करते थे जिनका नाम था मणिराम शर्मा द्विवेदी "नवीन"। मेरे ख्याल में उन्नाव के थे। उनके कुछ कविताखंड प्रस्तुत करता हूँ:
१। इतना तो करना स्वामी जब ये प्राण तन से निकलें
तन हो किसी लढ़ा पर, जिह्वा दही बड़े पर
उनके चबूतरे पर, ये प्राण तन से निकलें
२। पेटु जो पिराय तो मँगाय खाव चूरन
खाऊ बीर पंडित खलाए पेटु घूमा करैं
मन अभिलाष श्राद्ध मास करै पूरन
पेटु जो पिराय तो मँगाय खाव चूरन
छोटे मोटे बहुत सारे कवि हुआ करते थे। हमारे गाँव के पास नर्वल में जहाँ मैं सातवीं और आठवीं कक्षा में पढ़ा एक कवि थे, रामनारायण शर्मा "किसानबालक"। उनकी एक पंक्ति थीः "वासना कर विरक्ति में लीन, बजाता ब्रह्मवाद की बीन।" मैं भास्करानन्द इन्टरकालेज़ में पढ़ता था। वहाँ पर एक हिन्दी के अध्यापक थे द्विवेदी जी जो कविता लिखते थे। कालेज के सालाना जलसे में उनकी एक कविता सुनी थीः "मैं प्रेम नगर का वासी हूँ, मुझे प्रेम नगर को जाना है।" लम्बे बाल रखते थे और रसिकहृदय थे।
बी एन एस डी में ११वीं कक्षा में मेरे हिन्दी के अध्यापक रामेश्वर प्रसाद द्विवेदी भी कवि थे। ये जनाब अपने को बहुत ही प्रगतिशील और समाजवादी मानते थे और क्लास में भी प्रधानाचार्य श्री सद्गुरुशरण अवस्थी- जो जाने माने हिन्दी के विद्वान थे- की दकियानूसी की आलोचना किया करते थे। उनकी कोई कविता याद नहीं आ रही है। उनसे संबंधित एक कटु प्रसंग अवश्य याद है। मेरे साथ एक लड़का पढ़ता था अशोक, जिससे मेरी कुछ मित्रता थी किन्तु हमारी आर्थिक पृष्ठभूमि में बहुत अन्तर था जिसे अधिक मित्रता सम्भव नहीं थी। यह लड़का कानपुर के ए डी एम का पुत्र था किन्तु कोई गरूर नहीं था, सौम्य स्वभाव का था। बहरहाल तिमाही या छमाही परीक्षा में मेरा हिन्दी का परचा बहुत अच्छा हुआ था। मुझे उम्मीद थी कि टाप नम्बर मेरे ही आयेंगे। द्विवेदी जी ने उत्तरपुस्तिका लौटाने के पहले अशोक के परचे की बेहद तारीफ की। मैं सोच रहा था कि मेरा क्या हुआ। कापियाँ लौटाने के पहले द्विवेदी जी ने कहा कि "अरे हाँ, लक्ष्मीनारायण के भी अंक अशोक के बराबर हैं।" मैं गाँव से आया था, मेरा बाप ए डी एम नहीं था और मेरे कपड़े फटे पुराने थे। इतने वर्षों बाद भी यह बात खटकती है। विषय से थोड़ा भटक गया किन्तु यह भी बताना चाहूँगा कि सभी अध्यापक ऐसे नहीं थे। बिशुन नारायण टंडन अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। उन्होंने हमें "First Person Singular" पर एक निबंध लिखने को दिया था। मेरे निबंध पर उन्होंने लिखा था "Written with gusto" और सारे क्लास में मेरी कापी घुमाई गई थी। मुझे अपने ऊपर बड़ा गर्व हुआ था तब।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...८ मई २००६
Friday, May 05, 2006
शख़्स जो लाख
शख़्स जो लाख बातें करते हैं
क्या कभी वे भी आहें भरते हैं
आँख उनकी भी क्या नम होती है
जो हमेशा मज़ाक करते हैं
जो सब ज़माने को हँसाते हैं
क्या कभी ज़ार ज़ार रोते हैं
उसूल-ए-ज़िन्दगी है, कभी हँसना, कभी रोना
हँसने वाले भी कभी रोते हैं
रोने वाले भी कभी हँसते हैं
ये क्या हम रेडिओ पे सुनते हैं
इक कमीडियन ने ख़ुदकुशी कर ली, कहते हैं
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...५ मई २००६
क्या कभी वे भी आहें भरते हैं
आँख उनकी भी क्या नम होती है
जो हमेशा मज़ाक करते हैं
जो सब ज़माने को हँसाते हैं
क्या कभी ज़ार ज़ार रोते हैं
उसूल-ए-ज़िन्दगी है, कभी हँसना, कभी रोना
हँसने वाले भी कभी रोते हैं
रोने वाले भी कभी हँसते हैं
ये क्या हम रेडिओ पे सुनते हैं
इक कमीडियन ने ख़ुदकुशी कर ली, कहते हैं
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...५ मई २००६
Wednesday, May 03, 2006
भारत में विविधता
एक मित्र जो मेरी ही तरह कानपुर मूल के हैं, काम के सिलसिले से बँगलौर गये हुए हैं। वहाँ से लिखते हैं कि २ मई को कोई त्योहार बड़ी धूम धाम से मनाया जा रहा था। पूछने पर पता चला कि अक्षय तृतीया है जिसका सम्बन्ध परशुराम से है। मुझसे पूछते हैं कि मैं इस त्योहार के बारे में कुछ जानता हूँ। मुझे इस त्योहार का कोई ज्ञान नहीं तो मैं गूगल देव की शरण लेता हूँ। पता चलता है कि यह त्रेता युग का पहला दिन था जब भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। तब मैं सोचता हूँ कि त्योहारों में भी भारत में कितनी विविधता है। मैं समझता था कि दिवाली सारे भारत में मनाई जाती है। किन्तु यह भी सही नहीं है। केरल में दिवाली नहीं मनाई जाती है। वहाँ का सबसे बड़ा उत्सव ओनम है जिसमें महावली का पृथ्वी पर प्रति वर्ष आगमन होता है। ओनम भारत मैं और कहीं नहीं मनाया जाता।
अब विवाह की रश्मों को ही ले लीजिये। उत्तरप्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में- जहाँ तक मुझे ज्ञान है- अग्नि के सात फेरों के बिना विवाह को पूरा नहीं माना जाता। एक लोकगीत है जो मैंने फेरों के समय मैंने महिलाओं को गाते सुना हैः
पाहिलि पाहिलि भाँवरि बेटी अबहूँ कुँआरि
दूसरि....
.
.
छाँठिहि...
सातविं सातविं भाँवरि बेटी हो गइ पराइ।
लेकिन पंजाब में चार ही फेरे पड़ते हैं। ऋग्वेद में सोम और सूर्या के विवाह में चार ही फेरे पड़ते हैं। चार में से तीन फेरों में वर आगे होता है और एक में कन्या। जहाँ सात फेरे होते हैं चार में वर आगे होता है और तीन में कन्या। गुजरात और दक्षिण भारत के अधिकांश भागों में सप्तपदी होती हैं किन्तु उत्तरप्रदेश में कोई सप्तपदी नहीं होती। केरल की हिन्दू शादियों में फेरों जैसी कोई चीज़ नहीं होती। कुछ कर्मकांड दीप जलाने से होता है जो विवाह का मुख्य भाग है।
एक और उल्लेखनीय बात है। यदि आप सूर्या और सोम के विवाह का वर्णन पढ़ें तो मालूम पड़ेगा कि कन्या को वर पक्ष के लोग वर के घर ले आते हैं और शादी की सारी रश्में वर के ही घर पर होती हैं। हो सकता है कि अभी भी कहीं पर ऐसा ही होता हो।
उत्तर भारत में विवाह के पूर्व कन्या वर के दाहिनी ओर बैठती है और विवाह के पश्चात बाँई ओर किन्तु गुज्ररात और दक्षिण भारत में इसका उल्टा रिवाज़ है।
मेरा जन्म एक शाकाहारी परिवार में हुआ और मैं सोचता था कि सभी धार्मिक हिन्दू शाकाहारी होते हैं। बाद में मुझे मालूम हुआ कि यह बिलकुल ज़रूरी नहीं है। बंगाल में सभी मछली खाते हैं और इससे उनकी धर्मिकता का कोई वास्ता नहीं है। कश्मीरी पंडित बिरले ही शाकाहारी होते हैं। नेपाल और बाली के हिन्दू भी बिलकुल शाकाहारी नहीं है। किन्तु यह भी सत्य है कि उत्तरप्रदेश और गुजरात के धार्मिक हिन्दू लगभग सभी शाकाहारी मिलेंगे।
शायद भारतीय मुस्लिमों और ईसाइयों में भी ऐसी ही विविधतायें होंगी किन्तु मैं उनकी रीतियों से अधिक परिचित नहीं हूँ।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...३ मई २००६
अब विवाह की रश्मों को ही ले लीजिये। उत्तरप्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में- जहाँ तक मुझे ज्ञान है- अग्नि के सात फेरों के बिना विवाह को पूरा नहीं माना जाता। एक लोकगीत है जो मैंने फेरों के समय मैंने महिलाओं को गाते सुना हैः
पाहिलि पाहिलि भाँवरि बेटी अबहूँ कुँआरि
दूसरि....
.
.
छाँठिहि...
सातविं सातविं भाँवरि बेटी हो गइ पराइ।
लेकिन पंजाब में चार ही फेरे पड़ते हैं। ऋग्वेद में सोम और सूर्या के विवाह में चार ही फेरे पड़ते हैं। चार में से तीन फेरों में वर आगे होता है और एक में कन्या। जहाँ सात फेरे होते हैं चार में वर आगे होता है और तीन में कन्या। गुजरात और दक्षिण भारत के अधिकांश भागों में सप्तपदी होती हैं किन्तु उत्तरप्रदेश में कोई सप्तपदी नहीं होती। केरल की हिन्दू शादियों में फेरों जैसी कोई चीज़ नहीं होती। कुछ कर्मकांड दीप जलाने से होता है जो विवाह का मुख्य भाग है।
एक और उल्लेखनीय बात है। यदि आप सूर्या और सोम के विवाह का वर्णन पढ़ें तो मालूम पड़ेगा कि कन्या को वर पक्ष के लोग वर के घर ले आते हैं और शादी की सारी रश्में वर के ही घर पर होती हैं। हो सकता है कि अभी भी कहीं पर ऐसा ही होता हो।
उत्तर भारत में विवाह के पूर्व कन्या वर के दाहिनी ओर बैठती है और विवाह के पश्चात बाँई ओर किन्तु गुज्ररात और दक्षिण भारत में इसका उल्टा रिवाज़ है।
मेरा जन्म एक शाकाहारी परिवार में हुआ और मैं सोचता था कि सभी धार्मिक हिन्दू शाकाहारी होते हैं। बाद में मुझे मालूम हुआ कि यह बिलकुल ज़रूरी नहीं है। बंगाल में सभी मछली खाते हैं और इससे उनकी धर्मिकता का कोई वास्ता नहीं है। कश्मीरी पंडित बिरले ही शाकाहारी होते हैं। नेपाल और बाली के हिन्दू भी बिलकुल शाकाहारी नहीं है। किन्तु यह भी सत्य है कि उत्तरप्रदेश और गुजरात के धार्मिक हिन्दू लगभग सभी शाकाहारी मिलेंगे।
शायद भारतीय मुस्लिमों और ईसाइयों में भी ऐसी ही विविधतायें होंगी किन्तु मैं उनकी रीतियों से अधिक परिचित नहीं हूँ।
...लक्ष्मीनारायण गुप्त
...३ मई २००६
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