परदेशियों की होली है
न हँसी है, न ठिठोली है
जैसे बंजर में घास नहीं उगती है
यहाँ रंग की फुहार नहीं चलती है
रंग बिना होली बेरंग होती है
बिना चीनी की चाय फीकी होती है
बिना हुड़दंग के यह कैसी होली है
जैसे बिन भंग की ठंडाई घोली है
जो सभ्यता से खेली वह कैसी होली है
जो दिल खोल के खेली यारो वही होली है
न उपले हैं,न आग है, यह कैसी होली है
न धुलहठी, न फाग है, यह कैसी होली है
होली के नाम पर यह कैसी ठिठोली है
परदेशियों की होली है
न हँसी है, न ठिठोली है
---लक्ष्मीनारायण गुप्त
---२५ फरवरी २०१०
7 comments:
परदेशियों की होली है
न हँसी है, न ठिठोली है...
-फिर भी होली मुबारक!! :)
जायज बात कहते हैं आप! होली मुबारक!
समीर जी, अनूप जी,
बहुत धन्यवाद। आपको भी होली मुबारक।
ek prawassi kii peeda ke theek-theek sampreshan ke liye badhaiyan.
Rang Parv kii shubhkaamnaayen.
ashutosh madhav
लक्ष्मी जी
होली मुबारक
Holi Mubarak ho ji ...
Sach likha hai, itnee Barf giree hai tub kya HOLI ....
आप परदेस में किस प्रकार से होली खेलते हैं?
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