Tuesday, May 11, 2010

मेढ़की और मानव-एक लोक कथा



सुमिरन करिकै महादेव का

करिकै गौरी माँ को ध्यान।

एक मिचकुरी इक बुढ़ऊ का

किस्सा सुन्दर करौं बखान।

बुढ़ऊ जात रहैं रस्ता माँ

एक मिचकुरी परी देखाय।

बोली मोहिंका चूमि लेव तो

मैं बनि जाउँ सुन्दरी नारि।

तब हम तुम्हरी तिरिया बनिकै

सगरो बुढ़ापा देहुँ निकारि।

सेज बिछाकै तुमका प्यारे

कामकला ते देहुँ रिझाय।

एतना सुनिकै तब बुढ़ऊ ने

ओहि मिचकुरि का लीन उठाय।

ओहिं उठाकै जेब माँ धरिल्यौ

बुढ़उ चले डगर माँ जायँ।

थोरी देर माँ मिचकुरि बोली

देरी काहे रह्यो लगाय।

अधर चूमिल्यो मोरे प्रियतम

औ छाती ते लेहु लगाय।

ऐस करौ औ प्रियतम मोरे

अपनी सेज माँ लेहु सुलाय।

बुढ़ऊ बोले हमरे अन्दर

प्रेम करनकी शक्ति नायँ।

बात करन्ती मिचकुरि हमका

बड़े भाग ते मिलिगै भाय।


(मिचकुरी = मेढकी)


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---११ मई २०१०

Monday, May 03, 2010

अच्छा नहीं



अच्छा नहीं दोस्तो मेरे

मरने के पहले मर जाना

जब तक स्वास चल रही प्यारे

जीने का तुम लुत्फ़ उठाना

जब तक मदिरा है प्याली में

पीते जाना, पीते जाना

अमृत मिल रहा है जीवन में

उसको प्यारे क्यों ठुकराना

गरल मिल रहा है तो भी क्या

शिव की तरह पान कर जाना

भला बुरा जो भी आ जाए

सामना तुम करते ही जाना

मौत आज आ जाए

या फिर वर्षों जीते जाना

जब तक जीवन बाकी प्यारे

जीते जाना, जीते जाना

मौत आ गई तो क्या ग़म है

नहीं पड़ेगा है पछताना

अच्छा नहीं दोस्तो मेरे

मरने के पहले मर जाना


---लक्ष्मीनारायण गुप्त

---३ मई २०१०